संवाददाता उत्तम राजपूत नौगांव
नौगांव, गर्रोली रियासत मे पुरानी परम्परा आज भी कायम है श्री श्री 1008 श्री जगदीश स्वामी जू मंदिर से मां शारदा की सवारी निकली ग्रामीड़ो एवं श्रद्धालुओं ने किये दर्शन एवं गजानन द्वारा किया गया ताड़का वध, असत्य पर सत्य की हुई जीत
किसी ना किसी
प्रथा के पीछे कोई ना कोई कहानी जरूर होती है और ऐसी ही एक प्रथा की कहानी गर्रोली में भी है जो सालो से चली आ रही है वह है। शारदा माता मंदिर के पहाड़ के नीचे मैदान में ताड़का वध की। ताड़का वध रामायण के अनुसार भगवान श्री रामचंद्र जी ने किया था। ताड़का और मारीक्ष नाम के दो राक्षस विश्वामित्र और उनके साधु संतों का यज्ञ पूर्ण नहीं होने देते थे विश्वामित्र ने राजा दशरथ से राम और लक्ष्मण को अपने यज्ञ की रक्षा के लिए अपने साथ वन में यज्ञ की रक्षा के लिए साथ ले आए और रामचंद्र जी ने एक ही तीर में ताड़का को मार गिराया।
गरौली में मेला के साथ ताड़का वध की प्रथा
रियासत काल से चली आ रही इस ताड़का वध के साथ मेला की प्रथा रियासत काल में ताड़का का मेला लगभग एक माह तक लगता था। लेकिन अब एक ही दिन का मेले के साथ ताड़का वध का उत्सव चैत्र माह की दसवीं तिथि के दिन मनाया जाता है। गरौली की रियासत दीवान बहादुर गोपाल सिंह जू देव को सनद के अनुसार 1812 में अंग्रेजों द्वारा रियासत मिल गई थी। जिनकी रियासत में18 गांव शामिल थे
सूरज डूबने के पहले गजानन तहस नहस कर देते हैं ताड़के के पुतले को
सालों से चली आ रही इस प्रथा में श्री गणेश के रूप में हाथी ताड़का वध करते हैं ढोल नगाड़े की तेज आवाज से और ताड़का के पुतले को देखकर हाथी क्रोधित हो जाता है लेकिन वह तब तक पुतले का वध नहीं करता है। जब तक सूरज ढलने का समय न आ जाये। शाम चार बजे से यह यह प्रक्रिया शुरू हो जाती है ताड़का का बचाव दल पुतले को यहां से लेकर वहां भागता है जैसे ही सूर्य ढलने लगता है गजानन के रूप में हाथी क्रोध में आकर ताड़का का वध कर देता है। इस कार्यक्रम को देखने के लिये आसपास के करीब दर्जनों के गांव लोग आते हैं।
राजा रविंद्र सिंह जूदेव के अनुसार पुतरया पचवारा, कुलबारा कारतोल, गंज, करारा, रानीपुरा, भड़ियापुरा गरौली, सालाक, वनचोर, भटेरा, अमानपुरा, रिछारा, सिलारपुर, सतोरा, पड़रिया, कनेरा इन गांव के जमींदार खेतो की फसल काटने के बाद चैत्र के महीना में अपना अपना लगान
जमा करने आते थे। इन जमीदारों के मनोरंजन के लिए मेले के साथ ताड़का वध की प्रथा रियासत काल से चली आ रही है। रियासत काल में एक प्रथा और थी जो भी जमीदारो और जनता के साथ मेला के ताड़का प्रतियोगिता को देखने जाते थे सभी लोग सिर पर कुछ ना कुछ बांधे रहते थे। कुछलोग पगड़ी साफा या फिर
गमछे से सिर को ढके रहते थे। ताड़का वध प्रथा प्रतियोगिता के रूप में मनाई जाती थी जिस जमीदार के घोड़ा और हाथी से तड़का का वधा होता था उसे पुरस्कृत भी किया जाता था। आज भी गरौली में रियासत काल से चली आ रही प्रथा को 28 मार्च दिन शनिवार को यह हर्ष और उत्साह के साथ मनाया गया झांकी के रूप में हाथी पर सवार महर्षि विश्वामित्र जी के साथ राम लक्ष्मण बैठकर ताड़का मेला स्थल पर पहुंचे बैंडबाजे, डी,जे और पुलिस की व्यवस्था के साथ इस उत्सव को मनाया गया। इसके लिये पिछले कई दिनों से ताड़का का पुतला बनाने का काम चला। गांव के लोगो ने भी इस अवसर पर बढ़ चढ़कर भाग लिया। अब यह एक दिन का मेला आसपास के गांव के लिये मंनोरंजन का उत्सव बन गया है।
गांव के युवा ने संभाली कमान
पुरानी प्रथा के अनुसार ग्राम वासियों की ताड़का मेला और वध के लिये अलग ही आस्था है चैत्र नवरात्र की दसवीं को इसका आयोजन किया जाता है। इसबार ग्राम पंचायत के सरपंच प्रतिनिधि एवं समाजसेवी रूपेन्द्र तिवारी के द्वारा ग्रामीणों को पीने के पानी की व्यवस्था एवं अन्य कोई परेशानी ना हो इसकी व्यवस्था की गई कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में गर्रोली रियासत के राघवेंद्र सिंह जू देव(नाती राजा) उपस्थित रहे एवं नौगांव एसडीओ अमित मिश्रा जी अपने दलबल के साथ एवं गर्रोली चौकी प्रभारी कुलदीप सिंह जादौन द्वारा किया गया सुरक्षा का इंतजाम इस साल बड़ी धूमधाम से ताड़का मेला लगा और
ताड़का वध हुआ। एवं नीचे मंदिर पर हुआ भंडारा मेले में हजारों लोगों की संख्या उपस्थिति रही
