घास बीड़ की जमीन पर बने प्रधानमंत्री आवास! तहसीलदार की कार्रवाई पर सवाल


खैरलांजी। खैरलांजी तहसील अंतर्गत ग्राम किन्ही से एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां घास बीड़ (चरागाह) की भूमि पर बने प्रधानमंत्री आवासों को लेकर प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं। जानकारी के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों से इस भूमि पर मकान बनाकर रह रहे करीब 15 से 20 ग्रामीणों को तहसीलदार द्वारा नोटिस जारी कर 25 मार्च को पेशी के लिए बुलाया गया।

पेशी के दौरान तहसीलदार ने सभी ग्रामीणों पर 10,000 रुपए का जुर्माना लगाने के निर्देश दिए, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी एक भी बात नहीं सुनी गई।

यह है पूरा मामला
प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाए गए मकानों में गड़बड़ी सामने आई है। आरोप है कि जिन जमीनों पर ये मकान बनाए गए, उनका रिकॉर्ड में दर्ज प्रकार “घास बीड़” (चारागाह) है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब जमीन का स्वरूप चारागाह था, तो इन आवासों को स्वीकृति कैसे मिली?

सिस्टम पर उठे बड़े सवाल
मामले ने कई प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं—

सचिव और इंजीनियर द्वारा जियो-टैगिंग कैसे की गई?

क्या बिना स्थल जांच के ही आवास स्वीकृत कर दिए गए?

क्या इसमें अधिकारियों की मिलीभगत की आशंका है?


तहसीलदार की कार्रवाई भी विवादों में
मामला उजागर होने के बाद तहसीलदार द्वारा 10,000 रुपए का जुर्माना लगाया गया, लेकिन इसके बाद स्थिति और संदिग्ध हो गई। ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत में बुलाकर नायब तहसीलदार और पटवारी द्वारा कुछ मामलों को 2,500 रुपए और कुछ को 1,500 रुपए में “सेटल” कर दिया गया।

अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब जुर्माना 10,000 रुपए तय किया गया था, तो फिर कम राशि में समझौता कैसे हुआ? क्या यह कार्रवाई केवल दिखावे के लिए थी?

ग्रामीणों की मांग
ग्रामीणों का कहना है कि वे जिस भूमि पर रह रहे हैं, उसे आबादी भूमि घोषित किया जाए और उनके नाम दर्ज किए जाएं। उनका यह भी कहना है कि वे पहले भी दो बार तहसील में पेश होकर जुर्माना भर चुके हैं। ऐसे में बार-बार कार्रवाई से वे परेशान हैं।

ग्रामीणों ने प्रशासन से इस समस्या का स्थायी समाधान निकालने की मांग की है, ताकि उन्हें बार-बार आर्थिक और मानसिक परेशानी का सामना न करना पड़े।

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